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UPSC / IAS hindi medium Topper 2013 to 2018

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UPSC / IAS hindi medium Topper 2013 to 2018 list

दोस्तो UPSC 2018 पूरी मेरिट लिस्‍ट में हिंदी मीडियम से सबसे ज्‍यादा स्‍कोर करने वाले ने 337वीं रैंक हासिल की है. जो अब तक का सबसे खराब रिजल्‍ट है. आज हम आपको इसके पीछे क्या कारण है। और क्यो अब तक कोई भी हिंदी मीडियम टॉपर टॉप नही कर पाया। यह डिस्कस करेंगे।

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दोस्तो सबसे पहले हम 2013 से 2018 तक के सभी हिंदी मीडियम टोपर पर एक नज़र डालते है।

साल 2013 में
यूपीएससी ने सिलेबस बदला इस साल यूपीएससी में हिंदी मीडियम से करीब 25 ही कैंडिडेट चुने गए थे. इनमें से सिर्फ 1 ही आईएएस बन सका. हिंदी मीडियम से सबसे ज्‍यादा स्‍कोर करने वाले की रैंक 107 थी

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साल 2014 में हिंदी मीडियम से सबसे ज्‍यादा स्‍कोर करने वाले की रैंक थी 13. कुछ सफल छात्रों के बीच हिंदी मीडियम वालों की संख्या 5 फीसदी से कम थी.

साल 2015 में हिंदी मीडियम से सबसे ऊंची रैंक 61 थी। इसके बाद 99. मतलब टॉप 100 में हिंदी मीडियम से सिर्फ 2 कैंडिडेट थे।

साल 2016 में टॉप 50 में हिंदी माध्‍यम से 3 कैंडिडेट मेरिट लिस्‍ट में जगह बनाने में कामयाब रहे.

साल 2017 में हिंदी माध्‍यम से सबसे ज्‍यादा स्‍कोर करने वाले की रैंकिंग 146. कुल चयन 50 से भी कम थी

साल 2018 हिंदी माध्‍यम से सबसे ज्‍यादा स्‍कोर करने वाले की रैंकिंग 337 है. इसके बाद दूसरा रैंक 339 है

दोस्तो UPSC की सिविल सर्विसेज परीक्षा में अब तक हिंदी मीडियम से परीक्षा देकर कोई भी टॉप नहीं कर सका है. आईये जानते है इनके कुछ कारणों के बारे में जो सोशल मीडिया पर लोगो ने रखा है।

मुख्‍य परीक्षा की कॉपियां जांचने के लिए पैनल में जिन लोगों को शामिल किया जाता है, उनकी भाषा अंग्रेजी होती है. ऐसे लोग हिंदी में उतने ही सहज हों, ये कोई जरूरी नहीं है. इससे अंक में बड़ा फर्क आ जाता है.’’

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कुछ लोगो का कहना है कि बोर्ड के सदस्‍य हिंदी मीडियम वालों को दूसरी नजर से देखते हैं और मार्क्‍स देने में भेदभाव करते हैं.

कई कैंडिडेट का ऐसा अनुभव रहा है कि जब वे इंटरव्‍यू के दौरान हिंदी में बोलना शुरू करते हैं, तो उन्‍हें अपमानजनक टिप्‍पणियों का सामना करना पड़ा है. हिंदी को लेकर ताना सुनना आम बात है.

हिंदी मीडियम के कैंडिडेट को स्टडी मटेरिअल की कमी से जूझना पड़ता है. ज्‍यादातर बेहतर टेक्‍स्‍ट बुक और अच्‍छे कोचिंग नोट्स मूल रूप से अंग्रेजी में ही होते हैं.

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अगर अखबारों की बात करे तो द हिंदू और द इंडियन एक्‍सप्रेस के सामने हिंदी का कोई अखबार शायद ही टिकता हो. हिंदी से तैयारी करने वालों के लिए ढंग की वेबपसाइट तक नहीं है,

लिखने की स्‍पीड और अभ्‍यास से जुड़ी समस्‍या।

दोस्तो लिपि की वजह से अंग्रेजी की तुलना में हिंदी में लिखने में ज्‍यादा वक्‍त लगता है.

अंग्रेजी में अगर 1 मिनट में 25 शब्‍द लिखे जा सकते हैं, तो हिंदी में 25 शब्दो के लिये करीबन 1 मिनट 30 सेकेंड चाहिए होते है

कुछ लोगो का कहना है कि हिंदी मीडियम वाले कोचिंग नोट्स पर ज्‍यादा निर्भर हो जाते हैं. किताबों में लिखी बात से आगे सोचने का काम कोचिंग वालों पर छोड़ दिया जाता है.

अंग्रेजी वाले मॉडल पेपर सॉल्‍व करने पर फोकस करते हैं, जबकि हिंदी वाले यहां थोड़ी ढील दे देते हैं.

हिंदी वाले बार-बार किताब बदलते रहने की आदत के शिकार पाए जाते हैं. इस वजह से किसी भी सब्‍जेक्‍ट को लेकर उनका कॉन्‍सेप्‍ट क्‍ल‍ियर नहीं हो पाता.

सवालों का हिंदी में घटिया अनुवाद।

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दरअसल, सवाल मूल रूप से अंग्रेजी में सेट किए जाते हैं, फिर हिंदी में इनका अनुवाद किया जाता है.

परेशानी की बात ये है कि ऐसे अनुवाद ज्‍यादातर गूगल ट्रांसलेटर जैसे टूल से मशीनी तरीके से किए जाते हैं.

ऐसे सवाल भले ही हिंदी में हों, लेकिन इनका मतलब निकालना छात्र के लिए टेढ़ी खीर समान होता है.

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